किनारे लगाने के लिए
टीस उठी दो पल के लिए उन्हें हँसता देख, कितना दर्द सहा होगा ग़मों को छिपाने के लिए। न ख़ुद के लिए सर झुकाया, न जलाए चराग़, माँगी दुआ उनके ज़ेहन से यादें मिटाने के लिए। बेबसी ऐसी कि ख़ुद में सिमटे हैं, ये जानते हुए, कि बेतकल्लुफ़ी ज़रूरी है रिश्ता बनाने के लिए। इरादतन दूरी बनाए रखी, कम ही की बातें, फ़ासले भी ज़रूरी थे ज़माने को दिखाने के लिए। बिछड़ेंगे तो फिर कहाँ मिल पाएँगे, ‘आदर्श’, ज़रूरी है कोई वादा मुलाक़ात का, निभाने के लिए। कहानी न शुरू हुई, न ख़त्म होगी फिर भी, ये पूरी ज़िंदगी लगेगी उनको भुलाने के लिए। ख़ुद डूब भी जाएँ तूफ़ान-ए-हयात में तो ग़म नहीं, बस कुर्बान हो जान उन्हें किनारे लगाने के लिए।





