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निगाहें चुराते हैं वो...

निगाहों से निगाहें चुराते हैं वो देख कहीं और मुस्कुराते हैं वो बांधते हैं गेसू सिवा इक लट के उंगली से उसको घुमाते हैं वो। कुछ कहते-कहते हो जाते हैं ख़ामोश ‘कुछ नहीं’ कहकर हमें उलझाते हैं वो। आंखें उठाकर भरते हैं उजाले पलकें गिराकर चराग़ बुझाते हैं वो। इक हड़बड़ी सी में रहते हैं अक्सर फिर खुद पे ही झुंझलाते हैं वो। बोलते हुए भूल जाते हैं साँसें लेना चुप रहकर बेचैन किए जाते हैं वो। है बादल सी फ़ितरत उनकी ‘राठौर’ यूं आकर झट से चले जाते हैं वो। ऊपर गाने के लिहाज़ से बदलाव किए गए हैं। शुरू में ये लिखा था-  निगाहों से निगाहें चुराना उनका देख कहीं और मुस्कुराना उनका। रू ब रू होने से भी कहीं है बेहतर ख़्यालों में आ फ़ज़ा महकाना उनका। बाँधना गेसू मगर इक लट गिराना फिर उँगली से उसको घुमाना उनका। कुछ कहते-कहते हो जाना ख़ामोश 'कुछ नहीं' कह उलझाना उनका। आँखों की चमक से भरना उजाले पलकें गिरा चराग़ बुझाना उनका। इक हड़बड़ी सी में रहना अक्सर फिर खुद पर ही झुँझलाना उनका। बोलें तो भूल जाएं सांसें भी लेना चुप रहकर बेचैनी बढ़ाना उनका। है बादल सी ही फितरत उनकी 'आदर्श' यूँ आना और झट से चले जान...

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