Skip to main content

Posts

Featured

फूलों से भी ज़्यादा खिला था हाथ उनका...

दरख़्शाँ-ए-हयात लगा था साथ जिनका, बुझता जाए है तसव्वुर हर रात उनका। छाए रहे बादल, पर बरसी न इक भी बूंद, करती रही इंतज़ार वो बरसात उनका। क्या चीज़ है जो चाहें और मिल न सके, उतारती है जब सदक़ा ये कायनात उनका। लरज़कर थम गए देते हुए फूल उनको, फूलों से भी ज़्यादा खिला था हाथ उनका। देखकर आँसू भी जो टस से मस न हुए, क्या करेंगे लफ़्ज़ों में लिपटे जज़्बात उनका। उड़ने लगी रंगत, लड़खड़ाने लगी ज़बां, क्या हाल कर गए कुछ सवालात उनका। संजोकर बैठे हैं जो लाखों अरमां ‘आदर्श’, कैसे भर पाएगी मन इक मुलाक़ात उनका।

Latest Posts

बांधे रखो कुछ और देर ज़रा ज़ुल्फ़

किनारे लगाने के लिए

क्या बताऊं आपको कि क्या हुआ है

ज़रा थामिए निगाह

ग्रीन बोनस: मांग अच्छी मगर तर्क गलत

सरकाघाट के शोभा राम जिन्होंने राजा और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़ी कर दी थी फ़ौज

हिमकेयर योजना को बंद करना नहीं, इसे बेहतर बनाना है जरूरी

मैं पिटने ही वाला था कि अचानक आई एक आवाज...

एचआरटीसी और मुझ जैसे इमोशनल फ़ूल

पहले तलवार था, अब धार होता जा रहा हूं