बांधे रखो कुछ और देर ज़रा ज़ुल्फ़

गुरूर-ए-ख़ुदी को इतनी ऊंचाई न दो,
कि अपनों को भी तुम दिखाई न दो।

हमने नहीं पूछी बेरुख़ी की वजह,
यूं ही हर बात की सफ़ाई न दो।

नहीं मिलना है तो कह दो साफ़-साफ़
पर हर दफ़ा हालात की दुहाई न दो।

गुफ़्तगू से ही होंगे दूर गिले-शिक़वे
तकरार से मरासिम को रुसवाई न दो।

वो आएं तो रखना ख़याल ऐ दिल
धड़कना यूं कि दूर से सुनाई न दो।

बांधे रखो कुछ और देर ज़रा ज़ुल्फ़
शरारती ख़यालों को रिहाई न दो।

कुछ क़दम तो चल ही सकते हो साथ
राहें जुदा होने से पहले विदाई न दो।

पूछ लिया करो कभी तो हाल-ए-आदर्श,
दोस्त होकर भी इतनी तन्हाई न दो।

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