फूलों से भी ज़्यादा खिला था हाथ उनका...

दरख़्शाँ-ए-हयात लगा था साथ जिनका,
बुझता जाए है तसव्वुर हर रात उनका।

छाए रहे बादल, बरसी न इक भी बूंद,
करती रही बरसात भी इंतज़ार उनका।

क्या चीज़ है जो चाहें और मिल न सके,
उतारती है सदक़ा ये कायनात उनका।

सकपका सा गया देते हुए फूल उनको,
फूलों से भी ज़्यादा खिला था हाथ उनका।

देखकर आंसू भी जो टस से मस न हुए,
क्या करेंगे लफ़्ज़ों में लिपटे जज़्बात उनका।

उड़ने लगी रंगत, लड़खड़ाने लगी ज़बां,
क्या हाल कर गए कुछ सवालात उनका।

संजोकर बैठे हैं जो लाखों अरमां ‘आदर्श’,
कैसे भर पाएगी मन इक मुलाक़ात उनका।

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