किनारे लगाने के लिए



बदल बैठे हैं ख़ुद को वो उस ज़माने के लिए,
बदनाम है जो झूठ को सच दिखाने के लिए।

टीस उठी दो पल के लिए उन्हें हंसता देख,
कितना सहा होगा ग़मों को छिपाने के लिए।

न मांगी थी अपने लिए दुआ, मगर फैलाए हाथ
ज़ेहन से उनके याद-ए-रंज मिटाने के लिए।

ख़ुद तक सिमटकर बैठे हैं, जानते हुए भी,
बेतकल्लुफ़ी ज़रूरी है रिश्ता बनाने के लिए।

इरादतन दूरी बनाए रखी, कम ही की बातें,
ज़रूरी थे फ़ासले भी सबको दिखाने के लिए।

कहानी न शुरू हुई, न ख़त्म होगी फिर भी,
पूरी ज़िंदगी लगेगी उनको भुलाने के लिए।

डूब भी जाएं तूफ़ान-ए-हयात में तो ग़म नहीं,
कुर्बान हो जान उन्हें किनारे लगाने के लिए।

बिछड़ेंगे तो फिर कहां मिल पाएंगे, ‘आदर्श’,
ज़रूरी है वादा मुलाक़ात का निभाने के लिए।

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