क्या बताऊं आपको कि क्या हुआ है

क्या बताऊं आपको कि क्या हुआ है
ग़म भी भला क्या बांटने से कम हुआ है


उलझनों में उलझकर रहता हूं ख़ामोश
और वो कहते हैं कितना सुलझा हुआ है

छोड़ ऐ दिल अब किसी को क्या मनाना
क्या करूं जब वक़्त ही रूठा हुआ है

टूटते तारे से क्यों मांगूं मैं मन्नत
क्या करेगा ख़ुद ही जो टूटा हुआ है

रिश्ता न कोई अब किसी से जोड़ पाऊं
ख़ुद से ही जब बरसों से नाता छूटा हुआ है

दिलाकर यक़ीं ख़ुद ही को वादे पे तेरे
‘आदर्श’ अपनी ही नज़र में झूठा हुआ है

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