सैर का त्योहार: जानें, हिमाचल में क्यों और कैसे मनाया जाता है सैर या सायर का त्योहार

Image: साभार, Ajay Guleria

 

आज हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में सैर या सायर (पहाड़ी ऐक्सेंट में) का पर्व मनाया जा रहा है। इसे हिंदू कैलेंडर के अनुसार आश्विन माह के पहले प्रविष्टे यानी पहली तारीख को मनाया जाता है जिसे हिमाचल में सगरांद (संक्रांति) कहा जाता है। वैसे अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से हर साल यह दिन सितंबर महीने में पड़ता है। पहले तो यह एक हफ्ते तक मनाया जाता था और पर्व के बजाय एक उत्सव होता था। मगर आज समय किसके पास है? इसलिए एक दिन में सिमटकर रह गया है सैर का त्योहार।

करीब 12 साल पहले मैंने यह पता लगाने की कोशिश की थी कि आखिर क्यों यह त्योहार मनाया जाता है और इसे मनाने की शुरुआत कब हुई थी। शुरुआत का पता तो नहीं चल पाया था मगर काफी लोगों से बात करके और विचार-विमर्श करके मैं कुछ सवालों का जवाब ढूंढने में कामयाब रहा था।

पहले के दौर में न तो टीकाकरण होता था न ही बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर। बरसात के दिनों में पीने के लिए स्वच्छ पानी भी उपलब्ध नहीं होता था। ऐसे में बरसात के दिनों में कई संक्रामक बीमारियां फैल जाया करती थीं जिससे इंसानों और पशुओं को भी भारी नुकसान होता था।

ऊपर से पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश कभी-कभी इतनी तबाही मचाती थी कि फसलें भी बर्बाद हो जाती थीं। कभी बिजली गिर जाया करती थी। ये वो दिन होते थे जब सावन महीने में सभी महत्वपूर्ण कार्य और यात्राएं तक रोक दी जाती थीं। लोग घरों में बंद रहते और बरसात के बीत जाने का इंतजार करते।

सैर को दरअसल कुछ इलाकों में डैण (दुरात्मा) माना जाता था और लोग इसका नाम तक नहीं लेते थे। उनका मानना था कि बरसात में होने वाले नुकसान के लिए वही जिम्मेदार है। फिर जैसे की भारी बारिश का दौर खत्म होता, लोग इसे उत्सव की तरह मनाते। यह एक तरह का जश्न था कि बरसात बीत गई और हम सुरक्षित रहे। फिर सैर वाले दिन लोग दरअसल प्रकृति का शुक्रिया अदा करते थे कि चलो, अनहोनी नहीं हुई।

इसीलिए बरसात खत्म होने पर सैर के दिन सुबह ही ताजा फसल के आटे से रोट बनाए जाते, साथ ही देवताओं को नई फसलों और फलों वगैरह का भोग लगाया जाता। इनमें धान की बाली, भुट्टा (गुल्लू), खट्टा (बड़ी नीबू), ककड़ी वगैरह की भी पूजा होती। आज बरसात में उतना नुकसान न होता लेकिन त्योहार के रूप में सैर मनाई जाती है और परंपराओं को निभाते हुए ऊपर बताई सभी चीज़ों के साथ सैर का पूजन होता है। इस पर्व में अखरोट का विशेष महत्व है क्योंकि इस महीने तक अखरोट तैयार हो जाते हैं और उनकी छाल सूख चुकी होती है। तो पहले ही अखरोट उतारकर सुखाकर रख लिए जाते हैं।

सैर का हिंदी में अर्थ देखें तो इसका अर्थ होता है घूमना-फिरना। तो इस पर्व के पीछे सैर नाम इसलिए पड़ा हो सकता है क्योंकि पहले बारिश के कारण लंबी दूरियों पर जाने से बचने वाले लोग इसी दिन से यात्राएं आदि शुरू करते थे और बुजुर्ग आदि सगे संबंधियों से मुलाकात करने घर से निकलते थे। काले महीने के नाम से पहचाने जाने वाले भाद्रपद महीने में मायके गईं नई दुल्हनें भी सैर के साथ ही अपने ससुराल लौटती हैं। फिर पहले एक हफ्ते तर रिश्तेदारों के यहां आना-जाना लगा रहता था। फोन उस समय होते नहीं थे तो कुशल-मंगल जानने के लिए प्रोण-धमकी ही एक तरीका था। इस तरह से यह वास्तविक सैर थी यानी संभवत: इसीलिए इसका नाम सैर पड़ गया। वैसे संयोग ही कहें कि पुर्तगाली भाषा में Sair (उच्चारण- सएर) का इस्तेमाल बाहर निकलने के संदर्भ में होता है।

आज भी वही पुरानी परंपराएं जारी है और लोग सैर के दिन एक-दूसरे के यहां जाकर खाने-पीने की चीजों का आदान-प्रदान करते हैं। सैर के दिन सैर पूजन की सामग्री का पानी में विसर्जन करने के बाद प्रियजनों को राल यानी अखरोट की भेंट दी जाती है। दूब, फूलों और अखरोट को सौभाग्य के प्रतीक के रूप में दिए जाने को राल कहा जाता है। राल देने के बाद अपने से बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

पहले खोड़ (अखरोट) से निशाना लगाने का खेल भी खेला जाता था जिसमें लोग गांव या आस-पड़ोस के हर घर में जाकर यह खेल खेलते थे और यह होड़ लगी रहती थी कि कौन ज्यादा अखरोट जीतकर लाता है। निशाना लगाने के लिए मजबूत किस्म का अखरोट इस्तेमाल किया जाता था जिसका आकार बड़ा होता था। इसे भुट्टा कहा जाता था। इसके अलावा मधुमक्खी के छत्ते को पिघलाकर बनाए गए मोम से बना गोला भी भुट्टे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता था और अगर खेलने वाले सभी लोग राजी हों तो छोटे से गोल पत्थर को भी इस्तेमाल किया जा सकता था। मगर अफसोस, आजकल शायद ही कोई इस खेल को खेलता हो।

सैर पूजन के लिए सैर से पिछले दिन से ही कुछ इंतज़ाम करने पड़ते हैं क्योंकि अगले दिन सुबह ही पूजा करनी पड़ती है। धान का पौधा, तिल का पौधा, दाड़ू, पेठा, मक्की, ककड़ी, कोठा का पौधा, खट्टा, कचालू का पौधा, पुराना सिक्का आदि जुटाया जाता है। फिर इन्हें आंगन या ओटे में रख दिया जाता है। अगली सुबह इस टोकरी को पूजा वाली जगह लाकर रखा जाता है, गणेश जी की स्थापना होती है और इस पूरी सामग्री की पूजा की जाती है। ठीक उसी तरह से जैसे सामान्य रूप से पूजा की जाती है।

इस पूजा के दौरान ही रक्षाबंधन पर कलाई में बांधी गई राखी भी खोली जाती है और टोकरी पर अर्पित की जाती है। यह परंपरा बताती है कि हिमाचल में राखी दरअसल बहनों की ओर से बांधा गया रक्षा सूत्र होता है भाई की सलामती के लिए। न कि बहन इस धागे के बदले अपनी सुरक्षा का वचन मांगती है। यही कारण है कि हिमाचल में बहनों को भी राखी बांधने की परंपरा है।

परिवार के सभी सदस्य सैर पूजते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हर साल इसी तरह सुखदायी रहना। इसके बाद कुछ इलाकों में सैर की टोकरी को गोशाला में घुमाया जाता है और फिर चलते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

इस दिन पशुओं को भी सैर पर ले जाया जाता था। उन्हें गोशालाओं से निकालकर जंगलों में या घासनियों में उन जगहों पर ले जाया जाता था जहां पर बरसात में ताजा घास उग आई होती थी। इस घास को बचाकर इसी दिन के लिए रखा जाता है इसलिए इस नरम घास को सैरू का घास भी कहा जाता है। 

अब ये परंपराएं पीछे छूटती जा रही हैं। सांकेतिक रूप से ही सही, मगर सैर आज भी मनाई जाती है। यहां दिल्ली में तो मंडी जिले का एक संगठन हर साल सैर उत्सव मनाता है। शनिवार को ही उनका कार्यक्रम था मगर मैं जा नहं पाया। खैर, इस बार भी बरसात अच्छे बरसात निकल गई। इसलिए प्रकृति को शुक्रिया, आपको भी सैर मुबारक हो। आने वाला साल आपके लिए 

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